सभी नदियों के अन्तर्सम्बन्ध की योजना

इस योजना के सन्दर्भ में भी पूरा भारत पक्ष-विपक्ष में बँट गया है।और भारत की यह योजना भी कछुए से भी धीमी गति से आगे बढ़ रही है।एक पक्ष कहता है कि, यह योजना देश की अर्थव्यवस्था की समृद्धता, अर्थात, चहुँमुखी विकास के लिए सबसे उत्तम योजना है, अतः इसे फलीभूत होना ही चाहिए।दूसरा पक्ष कहता है कि भारत की सभी नदियों को आपस में जोड़ने का कार्य प्रकृति विरूद्ध प्रयास हो सकता है।

लेकिन, शाश्वत और सत्य तथ्य तो यही है कि, जब मानव जाति इस धरा पर थी ही नहीं और पृथ्वी पर प्रकृति अपने पूर्ण लावण्य पर थी, उस समय भारत की सारी नदियां आपसे में इंटर लिंक्ड थीं। हाँ, इस धरा पर जैसे-जैसे विभिन्न जीव-जंतुओं के साथ-साथ मानव जाति का भी प्रादुर्भाव बढ़ता गया, वैसे-वैसे ये नदियां सिकुड़ती, बदलती और सिमटती चली गईं, कुछ तो लुप्त प्रायः हो चुकी हैं। उदाहरणार्थ, थार की रेगिस्तानी भूमि। इतिहास कारों व अन्वेषणकर्ताओं के मुताबिक वहाँ पहले सरस्वती नदी बहा करती थी। यह भू-भाग गहरे वनों से पूरी तरह से आच्छादित था। मानव ने जब मांसाहारी जंतुओं, जैसे शेर, चीते, सियार, इत्यादि को लगभग उस हिस्से से खत्म कर दिया, तब ऐसे जंतु बच गए जो सिर्फ घास और पेड़-पौधों पर आश्रित थे। इन बचे हुए शाकाहारी जंतुओं ने उस हिस्से की अधिकतम वनस्पति चर डाली। वर्षा की कमी हो गयी। वनस्पति जगत भी धीरे-धीरे लुप्त हो गया। उस भू-भाग से कुछ जीव-जंतु तो अन्यंत्र पलायन कर गए और बहुत कुछ तो लुप्त ही हो गए, रह गया तो सिर्फ थार का रेगिस्तान। मानव ने अपने आप को हड़बड़ी पूर्वक जीवित रखने और अपने मौज-शौकों को पूरा करने के चक्कर में अंधाधुंध पेड़ों की कटाई की, जीव-जंतुओं को मारा और प्रकृति को असंतुलित कर दिया, फलतः सभी नदियां एक-दूसरी से पृथक होती चली गईं। आज वह सभी नदियों को जोड़ने की बात करता है और भारत की समूचि धरा को अपने स्वहित के चलते हरा-भरा कर देना चाहता है, तो मानव का यह कृत्य प्रकृति विरूद्ध नहीं, अपितु संगत ही है। सभी नदियों का पुनः अन्तर्सम्बन्ध बनने से भारत की पूरी जमीन हरी-भरी होगी, तो जाहिर सी बात है कि प्रकृति पुनः स्वयं अपनी यौवन अवस्था में आ सकेगी। हिन्दू-धर्म के मुताबिक गंगा-जमुना-सरस्वती का संगम था। आज नहीं है। लेकिन, उसी संगम की याद में, उस संगम की महत्ता के भावों में- कुम्भ का मेला आज भी लगता है और सदियों तक लगता रहेगा। भारत में गंगा-जमुना-सरस्वती नदियों के संगम स्थल पर हर साल लगने वाले तीर्थ मेले में संसार भर से लोग आते हैं। भारत के ग्रामीण आँचल की जनता तो इस स्थान पर जाने मात्र में ही अपने जीवन की सार्थकता सफल करती है, तो फिर, संगम को तीर्थ मानने वाली जनता फिर कैसे कर नदियों के अन्तर्सम्बन्ध का विरोध करे! हाँ, जनता अज्ञानी है, वह संगम को धार्मिक परिपेक्ष्य में तीर्थ तो मानती है, लेकिन संगम की भौतिक महत्ता से पूरी तरह से अनजान है। उसकी इसी अन्जानी प्रवृति का नाजायज फायदा उठाते हैं, कुछ तथाकथित रूप से ज्ञानी व स्वार्थी लोग।


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